श्राद्ध क्या है? महत्व और परंपराएँ

श्राद्ध हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है, जिसका आयोजन अपने पितरों (पूर्वजों) की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए किया जाता है। यह कर्म पितृ पक्ष में किया जाता है, जो भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक (लगभग 15 दिन) मनाया जाता है।

श्राद्ध की विधि

श्राद्ध का महत्व

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है—

  1. देव ऋण
  2. ऋषि ऋण
  3. पितृ ऋण

पितरों का ऋण चुकाने के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। माना जाता है कि श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं, और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

श्राद्ध की विधि

  • श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दक्षिणा दी जाती है।
  • पिंडदान किया जाता है, जिसमें चावल, तिल और जल अर्पित किया जाता है।
  • पितरों को याद करते हुए तर्पण (जल अर्पण) किया जाता है।
  • श्राद्ध में सात्विक भोजन का विशेष महत्व है।

श्राद्ध में क्या करें और क्या न करें

  • इस अवधि में मांस-मद्य, तामसिक भोजन और वर्जित कार्यों से बचना चाहिए।
  • श्राद्ध कर्म करते समय शुद्धता और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
  • गरीब और जरूरतमंदों को भोजन और दान देना श्राद्ध का मुख्य हिस्सा माना गया है।

पितृ पक्ष 2025 – श्राद्ध की तिथियाँ और महत्व

पितृ पक्ष (श्राद्ध) हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा के अगले दिन से अमावस्या तक मनाया जाता है। इस दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति और पितरों के आशीर्वाद के लिए तर्पण और पिंडदान किया जाता है।

पितृ पक्ष 2025 की तिथियाँ (Shradh Dates 2025)

  • आरंभ (Start Date): 7 सितंबर 2025, रविवार

  • समापन (End Date): 21 सितंबर 2025, रविवार (सर्व पितृ अमावस्या / महालया अमावस्या)

इन 16 दिनों को अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि माना जाता है कि इस समय पितरों की आत्माएँ धरती पर आती हैं और अपने वंशजों के तर्पण व श्रद्धा से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं।

निष्कर्ष

श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि यह अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्मरण का प्रतीक है। पितृ पक्ष में श्रद्धा से किया गया श्राद्ध परिवार के लिए शांति, सुख और समृद्धि लेकर आता है।

अधिक जानकारी के लिए आप मार्कंडेय महादेव धाम, वेबसाइट देख सकते हैं।

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